राजजात की मनौती छंतोली बैनोली गांव के शैलेश्वर मन्दिर में ही क्यों रोक दी जाती है नन्दा राजजात में क्यों नहीं ले जाई जाती है?

राजजात की मनौती छंतोली बैनोली गांव के शैलेश्वर मन्दिर में ही क्यों रोक दी जाती है नन्दा राजजात में क्यों नहीं ले जाई जाती है?

पदय

कांसुवा गांव के कुंवर लोग चांदपुर गढ के राजा के प्रतिनिधि /छोटे भाई माने जाते हैं,वे नन्दा की जात के लिए छिमटा गांव के रूड़ियों से एक छंतोली का निर्माण कराते हैं।इसे मनौती छंतोली कहा जाता है।इसी छंतोली को लेकर कांसुवा के राजकुंवर अपने कुल गुरु नौटियाल ब्राह्मणों के पास बसंत पंचमी को नौटी गांव पंहुंच कर मनौती कराते हैं।( नन्दा देवी की पूजा का उच्याणा ) बांधते हैं।
कुल गुरु नौटियाल ब्राह्मण ,राजकुंवरों से नन्दा की पूजा हिमालय स्थित होम कुण्ड तक पहुंचाने के लिए मनौती करते हैं। संकल्प मोती (चावल) कपड़े की पोटली में बांधा जाता है। कपड़े से बने पारम्परिक बटुए में पूजा भेंट छंतोली पर बांध देते हैं। मनौती उत्सव के समय राजजात की तिथि भी निर्धारित कर दी जाती है।

राज कुंवरों के हाथों मनौती कार्यक्रम सम्पन्न हो जाने के पश्चात ,कुल गुरु नौटियाल उसी दिन सांय को , मनौती छंतोली को समीप स्थित ग्राम बैनोली के शैलेश्वर मन्दिर में भेज देते हैं।वे इस छंतोली को शैलेश्वर मठ के पश्च भाग में स्थित नन्दा शक्ति पीठ मन्दिर में रखकर वापस चले जाते हैं।इसकी सूचना ग्राम बैनोली के ग्राम वासियों को भी नहीं दी जाती हैऔर नहीं उन्हें इस कार्यक्रम में सम्मिलित किया जाता रहा है।

तय कार्यक्रमानुसार जब श्री नन्दा देवी राजजात शुरू होती है तो नौटी के कुल गुरु नौटियाल ब्राह्मण ,राज कुंवरों से एक नई छंतोली बना कर लाने को कहते हैं।

कांसुवा के कुंवर लोग दूसरी नई छंतोली,एक छोटी स्वर्ण मूर्ति तथा चौसिंगा मेंढ़ा लेकर नौटी पहुंचते हैं।कुलगुरु नौटियाल, कुंवरों द्वारा लाई गई छंतोली तथा चौसिंगा मेंढ़ा की पूजा करते हैं। नौटियाल कुलगुरु चौसिंगा मेंढ़ा तथा छंतोली को राजजात में ले जाने का दायित्व खुद संभाल लेते हैं। प्रथम दिन यात्रा नौटी से बनाणी गांव जाती है और वहां से दूसरे दिन पुनः नौटी लौट आती है। इसके पश्चात निर्धारित पड़ावों के अनुसार आगे बढती है।
शैलेश्वर में रखी गई मनौती छंतोली राजजात में नहीं ले जायी जाती हैं। जिस छंतोली पर कुंवर लोगों के हाथों द्वारा किया गया संकल्प (उच्याणा) तथा भेंट बंधा होता है उसे शैलेश्वर मंदिर में ही छोड़ दिया जाता है।यह मनौती छंतोली अगले राजजात तक याने 12वर्ष तक शैलेश्वर में नन्दा शक्ति पीठ में ही खड़ी रहती है।इसका विधिवत विसर्जन भी नहीं किया जाता है।

जबकि सनातन मान्यताओं के अनुसार यात्रा के समापन पूजा के समय छंतोली पर बांधा हुआ संकल्प खोला जाना आवश्यक होता है तभी पूजा सम्पन्न मानी जाती है। अर्थात मनौती छंतोली को होम कुण्ड तक पहुंचना आवश्यक होता है।

जिस तरह किसी परिवार पर जब कोई दोष लगता है तो वह पूजा करने के लिए संकल्प या उच्याणा करता है। फलप्राप्ति के बाद जब वह पूजा करता है तो ब्राह्मण सबसे पहले पूजा में उच्याणा लाने को कहते है, तभी पूजा सम्पन्न होती है। यही सनातन धर्म की मान्यता भी है। लेकिन नौटी के कुलगुरु इसे परम्परा के विरुद्ध मानते हैं इसलिए मनौती छंतोली शैलेश्वर स्थित नन्दा शक्ति पीठ में ही छोड़ दी जाती है।

 

2000की मनौती छंतोली वर्ष 2014 तक शैलेश्वर मंदिर में खड़ी थी।जब 2014में नई छंतोली लाई गई तो पुरानी छंतोली कब वहां से हटा दी गई इसका कुछ पता नहीं। अब 2014 में रखी मनौती छंतोली बारह वर्षों से आज तक शैलेश्वर मन्दिर में संकल्प (उच्याणा)के साथ खड़ी है। इसके विसर्जन की भी कोई परम्परा नौटियाल कुल गुरु नहीं बता पा रहे हैं।इस छंतोली के यूं ही विसर्जन न किए जाने से बैनोली गांव वासियों पर दोष लग रहा है।
इस सम्बन्ध में नौटी के कुलगुरुओ़ का कहना है कि शैलेश्वर में छ़तोली रखने की परम्परा यह है कि ,शिवजी को शैलेश्वर से संदेश जाता है कि नन्दा कैलाश आने वाली है इसलिए मनौती के बाद छंतोली शैलेश्वर मंदिर में रखी जाती है।

बैनोली गांव वालों का कहना है कि जब नन्दा श्री यंत्र भी नौटी गांव में स्थित है और भैलेश्वर महादेव का भव्य मंदिर भी नौटी में स्थित है तो फ़िर शिवजी को सूचना नौटी से क्यों नहीं दी जा सकती है? भगवान शिव तो सर्वव्यापी हैं ।मनौती छंतोली को शैलेश्वर रखने की क्यों आवश्यकता पड़ती है?

बड़ा प्रश्न यह भी है कि यदि मनौती छंतोली को नहीं ले जाने की परम्परा है तो क्या नई छंतोली आने पर पुरानी छंतोली का विसर्जन नहीं किया जाना चाहिए? बिना विसर्जन किए मनौती छंतोली कहां रख दी जाती है ? यह भी विचारणीय प्रश्न है।

यहां पर यह उद्धृत करना जरूरी है कि बैनौली गांव के शैलेश्वर मन्दिर में इस छंतोली के खड़ी रह जाने से बैनोली गांव वासियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। वर्ष 2000की राजजात की समाप्ति के तुरन्त बाद गांव में एक के बाद एक आठ लोग स्वर्गीय हुए।वर्ष 2014की राजजात में जब नन्दा राजजात का समापन नौटी में हो रहा था, उसी दिन बैनोली गांव के नन्दा चौंरा मन्दिर के समीप सिलिंगी के पेड़ की बड़ी भारी टहनी बैनोली के नन्दा चौंरा स्थित मन्दिर के ऊपर जा गिरी।सिलिंगी का पेड़ श्री नन्दा का सबसे प्रिय पेड़ माना जाता है।इस पेड़ के धवल मंजरी की खुशबू कई मील तक पहुंचकर मंत्रमुग्ध कर देती है। शैलेश्वर शिवालय तथा बैनोली नन्दा चौंरा में सिंलगी के प्राचीन पेड़ आज भी मौजूद हैं।
वर्ष 2014की राजजात के समय जब नौटी से राजजात बैनोली के नन्दा चौंरा में पंहुंची थी तो वहां पर की घटना सबको याद होगी। नन्दा चौंरा में पंहुचते ही चौसिंगा मेंढ़ा शैलेश्वर मंदिर की ओर भागा था जिसे बमुश्किल पकड़ कर वापस लाया गया था। नन्दा छंतोली भी शैलेश्वर की तरफ़ बढ गई थी। सबसे आश्चर्यजनक बात यह हुई कि बैनोल़ी की अविवाहित बेटियां नन्दा चौंरा में विकराल रुप लेकर नाचने व चिल्लाने लगी थी। उन्होंने राजजात छंतोली को पकड़ कर शैलेश्वर जाने की ज़िद पकड़ ली थी।तब मनौती छंतोली के साथ के पण्डितों ने इन लड़कियों के मुंह में चावल भर दिए थे ताकि वे बोल न सके। जिन लोगों ने वहां पर कैमरे से विडियो बनाई थी उनमें यह दृश्य आज भी देखा जा सकता है।

शैलेश्वर मंदिर की हकीकत क्या है?

इसे भी जानना जरूरी है। स्कन्द पुराण में शैलेश्वर का वर्णन उत्तराखंड के ग्यारह केदार में वर्णित है। यहां पर पहले पत्थरों की छत वाला मकाननुमा मन्दिर था। जिसमें आदि शक्ति के रूप में श्री नन्दा की शक्ति कटार स्थापित है।लगभग सवा मीटर लम्बी कटार जमीन में मजबूती से गाढ़ी गई है। कत्यूरी नरेशों की नन्दा कटार के रूप में पूजी जाती रही है। कत्यूरी राजाओं के शासनकाल से यहां पर नन्दा का मन्दिर स्थापित है। नन्दा शक्ति पीठ के रूप में यहां पर विराजमान है।
नन्दा के इस मन्दिर में चांदपुर गढ़ी के राजाओं की कई तलवारें, खुंखरी,पंच युद्ध करने के अश्त्र -शस्त्र रखें हुए हैं। राजा की घोड़े में सवार मूर्ति, नन्दा की गर्दन तक की गान्धार शैली में निर्मित मूर्ति भी विद्यमान है। कई आकर्षक कड़े तथा चूड़ियां भी रखी गई हैं।
इसी मन्दिर में ओगड़ बाबा की समाधि भी स्थित है।औघड़ बाबा श्री नन्दा का परम भक्त था। चांदपुर गढ के राजा ने एक बार बाबा काअपमान किया था जिस पर औघड़ बाबा ने राजा को शाप दे दिया था कि , मढी रह जायेगी और गढी चलीं जायेगी।‌बताते हैं कि इसके बाद राजा को वास्तव में अपनी राजधानी देवलगढ़ बदलनी पड़ी। मनौती छंतोली इसी मन्दिर में रखी जाती है।
नन्दा मन्दिर के पार्श्व भाग में शिवजी का मन्दिर स्थित है।जिसे चांदपुर गढ के राजा ने बनवाया था।यह शैलेश्वर मठ के रूप में जाना जाता है।इस मन्दिर में शिवलिंग स्थापित है साथ ही शिव व नन्दा की प्रणय मुद्रा में खूबसूरत प्रस्तर मूर्ति भी स्थापित है। चांदपुर गढ़ी का राजा अजयपाल नाथपंथी था उन्होंने यहां पर शिव मठ की स्थापना की थी।सनद के रूप में इस मठ के निर्माण के समय मन्दिर के उत्तरी दीवार पर अपने महल पर बने दो चिन्ह भी चिनवा दिए थे।पहला मठ के उत्तरी भाग के दीवार पर महल के दीवारों पर बनी चित्रकारी का एक टुकड़ा तथा दूसरा, महल के पूर्वी भाग के दीवार पर अंकित राज चिन्ह की प्रतिकृति।ये दोनों आज भी साक्ष्य के रूप में मठ पर देखे जा सकते हैं। इससे सिद्ध होता है कि शैलेश्वर मठ का निर्माण चांदपुर गढ नरेश ने किया होगा।
शैलेश्वर में, शानदार पत्थर से बने चौक से नौ‌ फिट ऊंचे चबूतरे पर शक्ति रुपी नन्दा का मन्दिर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां तथा प्रवेश द्वार निर्मित किया गया है।जब कि शैलेश्वर मठ तक पंहुचने के लिए पश्चिम दिशा से पत्थर से निर्मित कलात्मक द्वार बनाया गया है।
शैलेश्वर चौक में लगभग पांचसौ आदमी बैठ सकते हैं जबकि चौक का विस्तार दक्षिण दिशा में एक बैठक नुमा कमरे तक फैला है इस बैठक के बाहर तिवारी की आकृति दी गई है।बैनोली के कानूनगो स्व आनन्द सिंह नेगी जी बताते थे कि यह राजा तथा उनके प्रतिनिधि के लिए बनाया गया था। इस बैठक का‌ उपयोग सार्वजनिक कार्यों, पूजा तथा मनौती जैसे कार्यों के लिए किया जाता था।
शैलेश्वर में पूजा के लिए महंत गिरि तथा गोस्वामी लोगों को राजा ने नियुक्त किया था।आज भी शिवालय में पूजा इन्हीं के द्वारा होती है।
शैलेश्वर में पूजा प्रवन्धन तथा व्यवस्था के लिए राजा ने नैणी गांव के सिंचित भूमि अर्थात सेरे गूंठ में प्रदान करवाए थे।इन खेतों में शैलेश्वर के महन्त लोग खेती करते हैं। कुछ खेतों को फुलवारी के नाम से पुकारा जाता है। बताते हैं कि इन खेतों में पूजा के लिये फूलों का उत्पादन किया जाता था।
एक अन्य किंवदंती के अनुसार जब नैणी गांव में नन्दा के साथ शिव काफी समय तक रहने लगे तब भैलेश्वर ने शिव का उपहास उड़ाया कि तुम्हें नन्दा के साथ इतने दिन रहते हो गये हैं क्या तुम्हें शर्म नहीं आ रही है।तब शैलेश्वर को अच्छा नहीं लगा और वे नैणी से बैनोली के एक ऊंची जगह पर रहने लगे।पति का अपमान नन्दा को भी अच्छा नहीं लगा व ह भी नैणी से आकर शिव के साथ रहने लगी। नन्दा के रुष्ट होने के कारण नैणी गांव में अनेक प्रकार की अनहोनी होने लगी। तब नैणी वालों ने अपने समस्त सिंचित खेत(सेरा) शैलेश्वर को चढ़ा दिए।इन खेतों में आज भी शैलेश्वर के पुजारी महंत गिरि लोग खेती करते हैं। कुछ खेत फूल उगाने के लिए रखे गए हैं जिन्हें गांव वाले आज भी फुलवारी पुकारते हैं। फुलवारी के फूल दोनों मन्दिरों में पूजा करने के लिए प्रयुक्त किए जाते रहे हैं।
शैलेश्वर में दोनों मन्दिरों में पूजा करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन नितान्त आवश्यक था। शिवालय में शुद्ध जल चढ़ाने के लिए एक कुआं का निर्माण किया गया था।यह कलात्मक कुआं आज भी विद्यमान है।इस कुएं के जल का उपयोग सिर्फ मन्दिर के पूजा के लिए किया जाता रहा है।इस कुंए तक जाने के कड़े नियम थे।
चांदपुर गढ़ी के राजा की ओर से शैलेश्वर केन्द्र स्थान धोषित था।च्यूकि यह स्थान चांदपुर गढ़ी से मात्र एक किमी हवाई दूरी पर स्थित है।सभी सार्वजनिक कार्यक्रम, कर वसूली, पूजा, अन्न संग्रह आदि कार्यक्रम यहीं पर सम्पन्न होते थे।
बैनोली गांव के मथुराखाली स्थान से चांदपुर गढ़ी एक रज्जू मार्ग से जुड़ा हुआ था ।शैलेश्वर में प्रजा द्वारा संकलित कर व अनाज,चांदपुर गढ़ी तक इसी रज्जू मार्ग से भेजा जाता था।मथुराखाली में एक पत्थर जमीन में गढ़ा हुआ है जिसका एक भाग आज भी विद्यमान है ।जिससे रज्जू मार्ग जुड़े रहने के प्रमाण मिलते हैं।
शैलेश्वर मंदिर बैनोली ग्राम सभा की जमीन पर स्थित है।इसकी व्यवस्था का उत्तरदायित्व भी इसी गांव का है।मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं,कि बैनोली गांव में चप्पे-चप्पे पर नन्दा का इतिहास मौजूद है।
शैलेश्वर में आदि नन्दा देवी की कटार शक्ति के रूप में पूजी जाती है। गांव के मध्य में नन्दा चौंरा नाम से नन्दा की शिला मूर्ति विद्यमान है। गांव से उतर दिशा में स्थापत्यकला का शानदार कुंआ जिसे नन्दा विहार के नाम से जाना जाता है स्थित है।यह हमेशा पानी से लबालब भरा रहता है।इस कुंए के अन्दर शानदार शेष शैय्या मे विष्णु भगवान की अद्भुत मूर्ति विराजमान है। चारों दिवारों में कई देवी देवताओं की मूर्तियां भी बनाई गई हैं । पुराने लोगों का मत है कि इसका निर्माण शंकराचार्य ने किया था। लेकिन स्थापत्य कला की साम्यता इसेआदिबद्री के मन्दिर से जोड़ती है। आदिबद्री तथा नन्दा विहार के मुख्य द्वार तथा द्वार के दोनों ओर
। पुराने लोगों का मत है कि इसका निर्माण शंकराचार्य ने किया था। लेकिन स्थापत्य कला की साम्यता इसेआदिबद्री के मन्दिर से जोड़ती है। आदिबद्री तथा नन्दा विहार के मुख्य द्वार तथा द्वार के दोनों ओर पवनदेव कि मूर्तियां एक जैसी समानता रखती हैं।
बैनोली गांव से एक किमी दूर लाटूसैंण स्थित है। राजस्व लेखों में लाटूसैंण नाम से यह स्थान बैनोली की धरोहर है। यहां पर नन्दा का धर्म भाई लाटू देवता की मूर्ति स्थित है।लाटूसैंण को अब नया नाम नन्दा सैंण पुकारा जाने लगा है। नन्दा चौंरा में स्थित मां नन्दा की मूर्ति 45अंश उतर पश्चिम की ओर धुमा कर रखी गई है जब कि लाटू सैंण में लाटूदेवता का मुंह नन्दा चौंरा में स्थित नन्दा देवी के मुंह के सरल रेखा में स्थित है। इस सम्बन्ध में एक किंवदंती प्रचलित है
एक बार मां नन्दा को अपने मायके में काफी दिन हो गये तो उन्हें शिव की याद सताने लगी। मां नन्दा ने अपने धर्म भाई लाटू को बुलाया और उसे ऊंची जगह पर जाकर यह बताने के लिए भेजा कि शिवजी इस समय कैलाश में क्या कर रहे हैं ? लाटू देवता लाटूसैंण में गया और वहां से शिवजी का पूरा हाल बताया। इसी लिए दोनों मूर्तियों के मुंह एक दूसरे के ठीक सामने है तथा दोनों मूर्तियों के पत्थर का आकार भी एक जैसा है। नन्दा सैंण में यह मूर्ति ठीक मैदान के बीच में स्थित है।इस मूर्ति को वहां से दूसरी जगह पर प्रतिस्थापित करने के लिए भव्य मन्दिर बनाया गया था ताकि मैदान बनाने में सुविधा हो जाय लेकिन लाटू देवता ने साफ़ इन्कार कर दिया। अब एक और मन्दिर लाटू की मूर्ति के करीब बनाया गया है फिर भी लाटू देवता मन्दिर में जाने को तैयार नहीं हैं।वे एक टक नन्दा के सामने रहना चाहते हैं।
बैनोली गांव का इतिहास बहुत पुराना तथा ऐतिहासिक महत्व का रहा है। कत्यूरी शासनकाल में यहां किसी छोटे क्षत्रप का शासन था। गांव के मध्य भाग में एक टीला नुमा पठारी भाग है जिसे बाजारखला पुकारा जाता है।यह एक किलानुमा आकृति है। दोनों ओर से मकान एक दूसरे से चिपके हुए तथा पूर्व और पश्चिम की ओर दो प्रवेश द्वार थे। ये प्रवेश द्वार लम्बी लम्बी शिलाओं को मिलाकर बनाये गये थे। इनके पत्थर आज भी यहां मौजूद हैं।इन दरवाजों को बन्द करके कोई अन्दर घुस नहीं सकता था। बाद में गढ़ नरेश अजयपाल ने इस ठकुराई को अपने साथ मिलाकर इन्हें अपना सामन्त बनाकर इन्हें दायित्व सौंप दिए। मेरे दादा बताते थे कि नन्दा विहार का पानी पूजा के लिए चांदपुर गढ़ी राजमहल तक रज्जू मार्ग से पंहुंचाया जाता था।
लम्बे इतिहास पर न जाकर मैं उस विषय पर आना चाहता हूं जिसे लेकर मेरे गांव के लोग समाधान चाहते हैं। श्री नन्दा देवी की मनौती छंतोली को नन्दा राजजात में क्यों नहीं ले जाई जाती है? उसे शैलेश्वर स्थित नन्दा शक्ति पीठ में क्यों स्थापित किया जाता है?
शैलैश्वर स्थित नन्दा शक्ति मन्दिर व औघड़ बाबा के स्थान में रखी वर्ष 2014की मनौती छंतोली का विसर्जन कौन करेगा? उस छंतोली में कुंवर लोगों का‌ संकल्प बंधा हुआ है।वह संकल्प अभी तक खुला नहीं है और नहीं उसका विसर्जन‌हुआ है ।
वर्ष 2027में आयोजित होने वाली मनौती छंतोली 23जनवरी बसंत पंचमी को इस मन्दिर में लाने की घोषणा कुलगुरु नौटियालों द्वारा की जा चुकी है। जब तक पुरानी छंतोली का विसर्जन नहीं किया जाता है तो नई छंतोली को स्थान कैसे दिया जा सकता है? यह विचारणीय प्रश्न है।
सन् 1925से पहले श्री नन्दा राजजात की‌ मनौती शैलैश्वर में होती रही है। यही केन्द्र स्थान था तथा शिव व नन्दा देवी के समक्ष कुंवर लोग अपने कुल गुरुओं को लाकर मनौती करते थे और राजजात का‌ दिनबार निकाल कर सभी सयानों और बारह थोकी ब्राह्मणों को सूचित किया जाता था और मनौती छंतोली को श्री नन्दा शक्ति पीठ शैलेश्वर में रख देते थे।
जब राजजात यात्रा का समय आता था तो कुंवर लोग छंतोली तथा बकरा लेकर शैलेश्वर पंहुचते थे। यहां पर कुल गुरुओं,सयानों, ब्राह्मणों की उपस्थिति में नन्दा देवी को पूजा देने का संकल्प होता था और छंतोली को यहीं पर नन्दा देवी के मंदिर में राजजात तक के लिए रख दी जाती थी।
राजजात के समय कुंवर लोग चौसिंगा मेंढ़ा, स्वर्ण मूर्ति,और छंतोली लेकर बैनोली के नन्दा चौंरा में पंहुचते थे ।शैलेश्वर से कुलगुरु नौटियाल ब्राह्मण छंतोली को शैलेश्वर से लाकर नन्दा चौंरा में पहुंचते थे।नैणी गांव से पुजारी भी अपनी छंतोली लेकर पहुंचते थे।इस मिलन के पश्चात सभी गणेश जी को हाथ जोड़कर कर नौटी पहुंचते थे।बैनोली नन्दा चौंरा के ठीक आगे एकमात्र गणेश जी का मन्दिर स्थित है। नन्दा राजजात के‌ निर्विघ्न पूर्ण होने की प्रार्थना की जाती थी।
वर्ष 1925के बाद नन्दा देवी राजजात सीधे 26वर्ष बाद सन् 1951 में आयोजित हुई। इतने लम्बे समयांतराल में बहुत कुछ पुरानी परम्पराएं अपने अनुसार बदलने का मौका मिला होगा।और यहीं से शैलेश्वर के बदले मनौती नौटी में करने का फैसला राजगुरु नौटियालों ने लिया होगा। लेकिन मन में शैलेश्वर की नन्दा और शिव शक्ति के दोष लगने का भय भी जरुर रहा होगा। इसी वजह से मनौती के बाद छंतोली शैलेश्वर में रख देने को नया रुप दिया गया । बाद में यही आगे परम्परा बन गई।
वर्ष 1925में नन्दा राजजात की मनौती और दिन बार तय करने सम्बन्धित मीटिंग शैलेश्वर में आयोजित किए जाने के प्रमाण स्वयं पूर्व महासचिव स्व पं देवराम नौटियाल जी के पत्रावलियों में अंकित है। जिसमें वे शिवानंद हरिकृष्ण मालगुजार नौटी वालों के 10गते असौज सम्बत 1982 सन 1925 में लिखा हुआ विवरण का हवाला देते हैं। जो निम्न प्रकार है –

“श्री नंदा देवी राजजात भादो 1982 विक्रम संवत सन् 1925 ई राजजात दोषोत्पति होने पर राजवंश के कुंवर लोग (कांसुवा गांव) रिंगाल की छंतोली, उच्याणा (देवता के चढ़ावा केलिए तय किया गया)बकरा लेकर नौटी आए) शैलेश्वर मंदिर में राजजात के बाबत एक बैठक बुलाई गई।बैठक में दिन निश्चित किया गया और चन्दा आदि तय किया गया।दिन तय होने पर कुरुड़ के पुजारियों को सूचना दी गई ”
इससे स्पष्ट होता है कि मनौती तथा सभी सार्वजनिक कार्यों का केन्द्र स्थान राजा द्वारा शैलेश्वर ही तय किया गया था।आज भी शैलेश्वर महंतों के पास जोअनाज नापने का पाथा विद्यमान है उसमें राजा का आदेश उत्कीर्ण किया गया है।जिसका पता मैंने स्वयं लगाया था।
सन् 1925 के बाद 26 सालके लम्बे अन्तराल के बाद राजजात 1951में आयोजित हुई।इस लम्बे अन्तराल का फायदा उठाकर नौटी के कुल गुरुओं ने मनौती शैलेश्वर के बजाय सीधे नौटी से करना शुरू कर दिया। लेकिन शैलेश्वर में नन्दा की शक्ति पीठ को समझते हुए मनौती के बाद चुपके से मनौती छंतोली को शैलेश्वर नन्दा के मंदिर में रखने लगे। नन्दा राजजात के समय इस मनौती छंतोली को न ले जाकर कुंवर लोगों से नई छंतोली मंगाकर उसे ले जाना शुरू कर दिया। मनौती छंतोली यहीं शैलेश्वर मंदिर में अगले राजजात तक खड़ी रहने लगी।
सन् 1951 की राजजात में इस बदलाव का प्रतिफल ही रहा होगा कि भारी ओलावृष्टि तथा हिमपात के कारण कई लोग हताहत हुए और भारी मुसीबतों के पश्चात राजजात को आधे रास्ते से वापस लौटने को बाध्य होना पड़ा।
हमेशा बैनोली तथा समीपवर्ती गांव के लोग इस मनौती छंतोली को राजजात में सम्मिलित करने हेतु आवाज उठाते रहे हैं।लेकिन नौटी के नौटियाल कुल गुरुओं ने इस बात को हमेशा नजरांदाज ही किया। यहां तक कि राजजात के इतिहास और प्रचार सामग्री में भी शैलेश्वर को हाशिए में रखा। मीडिया तक को भी इस सच्चाई से दूर रखा। मीडिया, इतिहास विशेषज्ञों तथा संस्कृति विज्ञों ने भी कभी शैलेश्वर के ऐतिहासिक तथ्यों को जानने की कोशिश नहीं की। यहां तक कि किसी भी राजजात में शैलेश्वर को राजजात का अंग नहीं माना गया। एक पैसा भी इस मंदिर के लिए बजट में कभी भी नहीं दिया गया। जबकि राजजात के दिन शैलेश्वर के निकटवर्ती गांव के पुरुष,महिलाएं, बच्चे यहां शैलेश्वर मन्दिर में दीपोत्सव मनाते हैं और रात भर‌ नन्दा देवी के मांगल गीत और जागर गाते हैं। इतना होते हुए भी शैलेश्वर को आजतक राजजात का अंग नहीं माना गया है

2014की राजजात में शैलेश्वर मन्दिर समिति ने इस मुद्दे को उठाया और नन्दा देवी राजजात समिति से अनुरोध किया कि हिमालयी महाकुंभ का हर अनुष्ठान भव्य होना चाहिए।नौटी से जो मनौती छंतोली शैलेश्वर लाई जा रही है इस आयोजन को भी भव्य क्यों नहीं बनाया जा रहा है। शैलेश्वर मन्दिर समिति की पहल पर‌‌ शैलेश्वर से जुड़े आठ दस गांवों की महिलाओं, पुरुषों ने इकट्ठा होकर‌ परम्परागत बाद्य यंत्रों के साथ आधे रास्ते तक मनौती छंतोली को लेने गये।उस दिन यह आयोजन इतना भव्य हुआ कि, राजजात जैसी भीड़ और भव्यता दिखाई दे रही थी। सम्मान के साथ छंतोली को शैलेश्वर में नन्दा शक्ति पीठ और औघड़ बाबा के मन्दिर में पूर्व की भांति रख दी गई। अफ़सोस तो तब हुआ जब नौटी नन्दा राजजात से जुड़े बड़े जिम्मेदार पदाधिकारी इस आयोजन से गायब रहे। मनौती छंतोली के साथ मात्र चार-छह लोग ही आये थे।इस भव्य कार्यक्रम का कहीं भी कोई समाचार अखबारों में नहीं छपा था।इसी दिन गांववासियों ने मनौती छंतोली के साथ आए‌ लोगों से कह दिया था कि इस वर्ष यह छंतोली राजजात में ले जानी होगी, लेकिन राजजात के समय वही हुआ जो नौटियाल कुल गुरु चाहते थे। मनौती छंतोली के बजाय दूसरी नई छंतोली को लेकर राजजात में चल दिए। आज तक मुख्य मनौती छंतोली शैलेश्वर में खड़ी ,टक लगाकर कैलाश जाने की आस लगाए हुई है।
इस वर्ष मुझे पता चला है कि शैलेश्वर मेला समिति ने निम्न तीन प्रस्ताव कांसुवा के राजकु़वरों , जिला प्रशासन तथा नौटी के नौटियाल कुल गुरुओं के सामने रखे हैं।

1- वर्ष 2014 में स्थापित मनौती छंतोली जो आज भी शैलेश्वर मंदिर में विराजमान है उसका विसजर्न किया जाय।

2-मनौती की परम्परा यदि नौटी में ही आयोजित होती है तो मनौती छंतोली को शैलेश्वर में लाने के बजाय नौटी के ही भैलेश्वर मन्दिर में रखी जाय।

3-यदि शैलेश्वर मंदिर में ही रखने की परम्परा है तो भव्य रुप से समारोह के साथ लाई जाय हम भी इसे और आकर्षक बनाने में सहयोग करेंगे,

लेकिन लिखित रूप में यह प्रस्ताव शैलेश्वर मंदिर समिति को दिया जाना होगा कि नन्दा राजजात में यह मनौती छंतोली भी कांसुवा के कुंवर और राजगुरु नौटियाल लेकर जायेंगे।
इस वर्ष भी मनौती के कार्यक्रम को भव्यता प्रदान करने में बैनोली सहित सभी समीपवर्ती ग्रामवासियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है इस आशय के साथ कि कुल गुरु नौटियाल ब्राह्मण सनातन मान्यताओं का आदर करते हुए राजकुंवरो की मनौती (उच्याणा) छंतोली को राजजात में ले‌जाकर होम कुण्ड में पूजा में समर्पित करेंगे। जय माता नन्दा देवी।

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